यह कविता एक मरते हुए व्यक्ति के आखिरी विचार हैं, जब वो ये चिन्तन कर रहा है कि उसने जीवन में आख़िर क्या खोया और क्या पाया ।

इन पल पल बहते लम्हों की हर याद संजोना भूल गया,
जीवन तो काट दिया मैंने पर जीवन जीना भूल गया

याद है वो दिन जब हाथ मे वो पहली कमाई थी,
वो कमाई जिसके लिये बचपन से योजनाएँ बनाई थी
सोचा था कभी कि उससे लाऊँगा किसी ज़रुरतमंद का खाना,
वो हाथ में जो आयी, उसे जेब में रख मैं अगली के इन्तज़ार में डूब गया

ऐसे जोड़ बहुत कुछ कमाया मैनें, बस वो दुआ कमाना भूल गया,
जीवन तो काट दिया मैंने पर जीवन जीना भूल गया

सोचा था कभी जाऊँगा चारों धाम, पर मैं सोचता ही रह गया
सोचा था मॉं को दूँगा साड़ी, पर मैं सोचता ही रह गया
सोचा था कुछ कर जाऊँ, फिर भाई के साथ पतंग उड़ाऊँगा
सोचा था कुछ बन जाऊँ, फिर बहन को चुनरी लाऊँगा

अपने अपनों को देकर यही भ्रम कि मैं दिल से उनका अपना नहीं,
अपने दिल को देकर यही भ्रम कि फुर्सत पाकर कभी उनका बनूँगा
आज बन गया सब बनकर भी अधूरा, मेरे सामने ये जीवन बीत गया,
इस पैसे से सब ख़रीदा मैंने, बस दुआ कमाना भूल गया

शोहरत तो हासिल की काफ़ी पर प्यार कमाना भूल गया,
जीवन तो काट दिया मैंने पर जीवन जीना भूल गया

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