This poem is about the increasing violence in the name of religion by people who probably do not understand the concept of religion in itself.

ना पहनते रामनामी तन पर अगर हम,
बस सत्यवाद का कभी किसी नें तप लिया होता ।
ना लुटाता कोई दान में हीरे या मोती,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जो होता ।

जीवन रहता धर्माडंबरों सॆ दूर पर
सत्यवाद का कभी किसी नें तप लिया होता ।
धर्मो के नये अर्थ निकालने से पहले
कभी धर्म को समझने का प्रयत्न किया होता ।

ना होती तब एक दुनिया में तब इतनी कई दुनिया,
ना होती तब एक माटी पर इतनी कई माटी,
ना होती रोज के खेल जैसी ये हिंसा.
रक्त नहीं, फूलों से महकती धरती की घाटी ।

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